नई दिल्ली : लेबनान और सीरिया (Lebanon–Syria) में एक साथ हुए पेजर धमाके (lebanon pager blast) ने हिजबुल्लाह की नींद हराम कर दी है। इस घटना ने जहाँ हिजबुल्लाह (Hezbollah) की कमर तोड़ दी है, वही एक बार फिर से वैश्विक स्तर पर इज़रायल (Israel) के जासूसी संगठन मोसाद (Mossad) की चर्चा होने लगी है। दरअसल पेजर एक डिवाइस है, जिसके माध्यम से हिजबुल्लाह के लड़ाके आपस में एक दूसरे से संपर्क स्थापित करते हैं। बताया जा रहा है कि इसी पेजर को हैक कर एक साथ सभी पेजरों में विस्फोट करा दिया गया, जिसमें क़रीब एक दर्जन लोगों की मौत हो गई, जबकि क़रीब 3000 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। इस घटना से हिजबुल्लाह बनाम इज़रायल (Hezbollah vs Israel) युद्ध की आशंका भी प्रबल हो गई है।
दरअसल, हिजबुल्लाह ने घटना को लेकर बयान जारी किया है, जिसमें इस घटना के लिए इज़राइल (Israel) को जिम्मेदार ठहराया गया है, साथ ही जवाबी कार्रवाई की धमकी भी दी गयी है। हालाँकि इज़रायल की तरफ से अभी तक इस घटना को लेकर कोई बयान सामने नहीं आया है। लेकिन हिजबुल्लाह से इज़रायल की जिस तरह से तनातनी रही है, उससे वैश्विक स्तर पर इस घटना को अंजाम देने में मोसाद की अहम् भूमिका बताई जा रही है। आखिर हिज़्बुल्लाह और इज़राइल के बीच टकराव की वजह क्या है ?
क्या फ़िलिस्तीन ही है इज़रायल और Hezbollah के बीच के गतिरोध की वजह ?
दरअसल, मध्य पूर्व की राजनीति और संघर्षों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है इज़रायल और हिजबुल्लाह के बीच का गतिरोध (Hezbollah vs Israel War)। इस गतिरोध की कई वजहें हैं, जिसको लेकर दोनों के बीच समय-समय पर टकराव होता रहता है। एक वजह फ़िलिस्तीन (Palestine) भी है, जिसकी मदद के लिए हिजबुल्लाह द्वारा इज़रायल पर हमले भी किए जाते हैं और इस हमले के जवाब में इज़रायल भी जवाबी कार्रवाई करता है। लेकिन फिलिस्तीन से इतर हिजबुल्लाह, इज़रायल को एक ऐसे देश के तौर पर देखता है, जो लेबनान पर कब्ज़ा कारण चाहता है और इसीलिए वो इज़रायल को दुश्मन देश मानता है। फिलिस्तीन और लेबनान, दोनों ही देश मुस्लिम बहुल देश है और फ़िलिस्तीन के समर्थन में अक्सर सभी मुस्लिम देश लामबंद होते हैं, जिससे मुस्लिम देशों की यहूदी देश इज़रायल से टकराव बीते कई दशकों से चल रही है।
Hezbollah का गठन क्यों हुआ था ?
हिजबुल्लाह का शाब्दिक अर्थ ‘अल्लाह की पार्टी’ है, जिसका गठन इज़रायल के ख़िलाफ़ युद्ध के लिए ही हुआ था। यह लेबनान का एक राजनीतिक (Political Party of Lebnon) और अर्द्ध सैनिक संगठन है। 1982 में शिया मुस्लिमों का यह संगठन उस समय अस्तित्व में आया, जब दक्षिण लेबनान पर क़ब्ज़े के मंशे से इज़रायल ने प्रवेश किया। दक्षिण लेबनान से इज़रायल को बाहर निकालने और शिया मुस्लिमों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए गठित इस संगठन ने इज़रायली सेना के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध लड़ना शुरू किया और समय के साथ लेबनान का एक शक्तिशाली संगठन बन गया। हिजबुल्लाह, ईरान के शासन को अपना आदर्श मानता है और यही वजह है कि जब हिज़्बुल्लाह पर इज़रायल ने शिकंजा कसा तो ईरान भी खुलकर हिज़्बुल्लाह के समर्थन में आ गया और इज़रायल को जवाबी कार्रवाई की चेतावनी तक दे डाली है।
क्यों आतंकी संगठन के रूप में जाना जाता है हिजबुल्लाह ?
1980 के दशक और 1990 के दशक में हिजबुल्लाह और इजरायल के बीच कई छोटे और बड़े संघर्ष हुए। हिजबुल्लाह ने इजरायल के खिलाफ आत्मघाती हमले, रॉकेट हमले और अपहरण जैसी गतिविधियों को अंजाम दिया, जिससे इसकी पहचान एक आतंकवादी संगठन के रूप में की जाने लगी। इजरायल ने भी हिजबुल्लाह के खिलाफ कई सैन्य कार्रवाइयां कीं, जिनमें हवाई हमले और दक्षिणी लेबनान में उसके ठिकानों पर हमले शामिल थे। 1992 में, हिजबुल्लाह के नेता अब्बास मुसावी की हत्या के बाद, संगठन ने अपने नेतृत्व में हसन नसरल्लाह को चुना, जिसने हिजबुल्लाह को और अधिक संगठित और प्रभावी बनाया। साल 2000 में जब इजरायल ने अंतरराष्ट्रीय दबाव और लगातार हिजबुल्लाह के हमलों के चलते दक्षिणी लेबनान से अपनी सेना को वापस बुलाने का फैसला किया तो इसे हिजबुल्लाह की एक बड़ी जीत के रूप में देखा गया और इससे उसकी लोकप्रियता में इजाफा हुआ। हालांकि, इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच तनाव जारी रहा, और दोनों पक्षों के बीच कई बार छोटी-मोटी झड़पें होती रहीं।
2006 में इज़रायली सेना की कार्रवाई से टूटी संगठन की कमर
इस युद्ध की शुरुआत तब हुई जब हिजबुल्लाह ने इजरायली सैनिकों का अपहरण कर लिया और इसके जवाब में इजरायल ने बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू किया। यह युद्ध लगभग एक महीने तक चला, जिसमें हजारों नागरिकों की मौत हुई और लेबनान के बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा। भारी तबाही से यह आज तक नहीं उबर पाया। युद्ध के अंत में, हिजबुल्लाह ने खुद को एक मजबूत प्रतिरोध बल के रूप में पेश किया और उसकी लोकप्रियता लेबनान के शिया समुदाय के बीच और बढ़ी। हालांकि, इजरायल ने भी दावा किया कि उसने हिजबुल्लाह की सैन्य क्षमता को कमजोर किया है। हिजबुल्लाह ने अपनी सैन्य क्षमताओं को फिर से संगठित किया और बढ़ाया। उसने अपनी मिसाइल और रॉकेट क्षमताओं में सुधार किया, जो इजरायल के लिए एक निरंतर खतरा बने रहे। इस दौरान हिजबुल्लाह ने सीरिया और ईरान से भी सैन्य और वित्तीय सहायता प्राप्त की, जो उसे और मजबूत बनाने में सहायक साबित हुई।
कैसे अपने ही देश के लिए अभिशाप साबित हुआ ‘हिज़्बुल्लाह’ ?
हिजबुल्लाह ने लेबनान के कुछ हिस्सों में सकारात्मक भूमिका निभाई है, लेकिन इसके उदय ने देश के लिए कई गंभीर चुनौतियां खड़ी की हैं।हिजबुल्लाह को कई पश्चिमी देशों और अरब राष्ट्रों द्वारा एक आतंकवादी संगठन माना जाता है, जिसके कारण लेबनान को अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है। इससे देश की अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ है और विदेशी निवेश घटा है। सुरक्षा चिंताओं के कारण पर्यटन, जो लेबनान की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था, भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ है।कुल मिलाकर हिजबुल्लाह और इजराइल के बीच का संघर्ष केवल सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक, धार्मिक और क्षेत्रीय संघर्षों का मिश्रण है। इस संघर्ष ने लेबनान और इजराइल के समाजों पर गहरा असर डाला है और मध्य पूर्व की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भविष्य में इस संघर्ष का समाधान आसान नहीं है, लेकिन क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय समझौतों के माध्यम से इसे हल करने के प्रयास जारी हैं।


