Delhi: दिल्ली में प्रो. सुखवीर संघल की एकल कला प्रदर्शनी का भव्य आयोजन: “The Silent Canvas Speaks Again”
रिपोर्ट, हेमंत कुमार।
नई दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, एनेक्सी आर्ट गैलरी में प्रख्यात चित्रकार, स्वतंत्रता सेनानी और कला गुरु प्रो. सुखवीर संघल को समर्पित एक ऐतिहासिक solo art exhibition का शुभारंभ हुआ। 33 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद दिल्लीवासियों को उनकी दुर्लभ और विलक्षण कला का साक्षात्कार एक बार फिर मिला। इस प्रदर्शनी में उनकी 38 उत्कृष्ट पेंटिंग्स को प्रदर्शित किया गया, जो उनके बहुआयामी रचनात्मक व्यक्तित्व की झलक देती हैं।
यह आयोजन कई कला और साहित्यिक दिग्गजों की गरिमामयी उपस्थिति में संपन्न हुआ, जिनमें पद्म भूषण जतिन दास, सुप्रसिद्ध कला समालोचक श्रीमती उमा नैयर और ख्यातिलब्ध कवि श्री प्रयाग शुक्ल शामिल रहे। प्रदर्शनी का क्यूरेशन उनकी पौत्री प्रियम चंद्रा द्वारा किया गया, जिन्होंने इसे अपने दादा को एक भावभीनी श्रद्धांजलि के रूप में प्रस्तुत किया।
प्रो. सुखवीर संघल (1914–2006) उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फरनगर में जन्मे थे। वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, आदर्श शिक्षक, और दूरदर्शी कलाकार थे। उन्होंने लखनऊ के गवर्नमेंट स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स से औपचारिक कला शिक्षा प्राप्त की और 1938 में प्रयागराज में ‘कला भारती’ की स्थापना की — एक ऐसा संस्थान जो चित्रकला, संगीत और नृत्य को समर्पित रहा।
उनके मार्गदर्शक ए.के. हालदर और अवनींद्रनाथ टैगोर जैसे दिग्गज कलाकार रहे। वे लखनऊ आर्ट स्कूल के प्राचार्य भी रहे और 1973 तक इस पद पर अपनी सेवा दी। बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट की वॉश पेंटिंग तकनीक में उनके मौलिक प्रयोगों ने उन्हें एक विशिष्ट स्थान दिलाया। उनके कार्यों में गहरी दार्शनिकता, भावनात्मक गहराई और भारतीय परंपरा की समृद्ध झलक मिलती है।
वे रेशम, लकड़ी, ऑयल पेंटिंग, मूर्तिकला समेत कई माध्यमों में सिद्धहस्त थे। उन्होंने ‘भारतीय चित्रकला पद्धति’ नामक पुस्तक लिखी और ‘एवोल्यूशन ऑफ आर्ट एंड आर्टिस्ट’ नामक तीन-भागीय ग्रंथ तैयार किया, जिसे उनके परिवार द्वारा प्रकाशित करने की योजना पर कार्य किया जा रहा है।
उनकी पेंटिंग “Thou art dust, to dust returnest” को ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम ने अपने संग्रह में स्थान दिया था। इतना ही नहीं, पंडित नेहरू के आग्रह पर 1942 में इंदिरा गांधी के विवाह का निमंत्रण पत्र भी उन्होंने ही डिजाइन किया था, जिसे देश-विदेश में सराहा गया।
1992 में उन्होंने ललित कला अकादमी, नई दिल्ली में एक भव्य एकल प्रदर्शनी की थी। सेवानिवृत्ति के बाद वे लखनऊ स्थित अपने आवास पर नवोदित कलाकारों को नि:शुल्क कला सिखाते रहे। वे संगीत के प्रेमी थे और पं. भोला भट्ट से पांच वर्षों तक शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली। साथ ही वे प्राकृतिक चिकित्सा, योग और वैकल्पिक चिकित्सा के भी ज्ञाता थे।
उनकी शांत और प्रचार से दूर रहने वाली जीवनशैली आज के कलाकारों के लिए प्रेरणा है। 29 नवंबर 2006 को उनका देहावसान हुआ। लेकिन उनके जाने के बाद भी उनकी कला जीवंत है और लगातार सम्मानित की जा रही है।
2022 में उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला अकादमी ने उनकी स्मृति में एक विशेष प्रदर्शनी का आयोजन किया, जबकि लखनऊ मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ने उनके चित्रों को अपनी प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया। उनकी 108वीं और 109वीं जयंती पर लखनऊ में वॉश पेंटिंग कार्यशालाएं और प्रदर्शनी भी आयोजित की गईं। सम्मान स्वरूप लखनऊ नगर निगम ने उनके आवास के सामने की सड़क को “प्रो. सुखवीर संघल रोड” नाम दिया।
उनकी कला भारतीय संस्कृति, दार्शनिक सोच और रचनात्मक चेतना का एक अद्वितीय संगम है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देती रहेगी।
प्रदर्शनी “The Silent Canvas Speaks Again” 9 जून से 17 जून 2025 तक इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, एनेक्सी आर्ट गैलरी, नई दिल्ली में दर्शकों के लिए खुली रहेगी।



