नई दिल्ली : 2024 में हुए लोकसभा चुनाव (Loksabha Election 2024) से पहले बीजेपी (Bhartiya Janta Party) ने सरकार गठन के बाद एक देश-एक चुनाव (One Nation One Election) की व्यवस्था को लागु करने का वादा किया था और अब इस दिशा में सरकार (Modi Government) ने कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। केंद्र की मोदी कैबिनेट (Modi Cabinet) ने एक देश-एक चुनाव के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।
इससे पहले मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल (2nd Term Of Modi Government) में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद (Ex President Ramnath Kovind) की अध्यक्षता में गठित समिति ने एक देश-एक चुनाव को लेकर विस्तृत समीक्षा की वो इससे जुड़े रिपोर्ट कैबिनेट के सामने रखे, जिसे अब मोदी कैबिनेट का ग्रीन सिग्नल मिल गया है। देश में एक साथ विधानसभा और लोकसभा के चुनाव को लेकर मोदी सरकार की पहल मोदी सरकार का सराहनीय प्रयास जरूर है, लेकिन एक समय ऐसा था, जब देश में एक साथ विधानसभा और लोकसभा के चुनाव होते हैं। आखिर किस वजह से व्यवस्था जारी नहीं रही, इसी की चर्चा हम इस आलेख में करेंगे।
आज़ादी के भारत में एक साथ होते थे विधानसभा और लोकसभा के चुनाव
दरअसल, देश को आज़ादी मिलने के बाद जब लोकतांत्रिक व्यवस्था (democratic system) लागु हुई, तब कई सालों तक भारत में एक देश एक चुनाव ही होता था यानी कि सभी राज्यों के विधान सभा और केंद्र सरकार बनाने के लिए लोक सभा चुनाव एक साथ कराए जाते थे। लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के लिए पहला आम चुनाव 1951-52 में एक साथ आयोजित किया गया था। यह प्रथा 1957, 1962 और 1967 में हुए तीन आम चुनावों में भी जारी रही।
क्यों टूटा एक साथ चुनावों का क्रम ?
दरअसल, 1968 और 1969 में कुछ विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने के कारण यह चक्र बाधित हो गया। 1970 में, लोकसभा को समय से पहले ही भंग कर दिया गया और 1971 में नए चुनाव कराए गए। इस प्रकार, पहली, दूसरी और तीसरी लोकसभा ने पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। लोक सभा और विभिन्न राज्य विधान सभाओं के समय से पहले विघटन और कार्यकाल विस्तार के परिणामस्वरूप, लोक सभा और राज्य विधान सभाओं के लिए अलग-अलग चुनाव हुए हैं, और एक साथ चुनाव कराने का चक्र बाधित हुआ।
इंदिरा सरकार की वजह से टूटा था एक साथ चुनावों का क्रम
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Former Prime Minister Indira Gandhi) ने साल 1970 में लोकसभा भंग करवा दी थी और तय समय से 15 महीने पहले ही 1971 में आम चुनाव करवा दिए थे। इंदिरा अल्पमत सरकार चला रही थीं और पूर्ण सत्ता चाहती थीं। उनके इस फैसले ने राज्य विधानसभा चुनावों को आम चुनाव से अलग कर दिया था। इसके अलावा विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों के अस्तित्व में आने के बाद व संयुक्त दलों की सरकार बनने के बाद सरकार के 5 साल के कार्यकाल पूर्ण न होने व मध्यावधि चुनाव होने से भी ये क्रम बाधित हुआ, जिसके बाद से ये क्रम बाधित ही है।
भारत में एक देश-एक चुनाव की व्यवस्था क्यों जरुरी है ?
दरअसल, भारत जैसे बड़े देश में हर कुछ महीनों के समय में कहीं ना कहीं चुनाव होते रहते हैं, पूरे देश का ध्यान उस तरफ आकर्षित होता है, राजनीति तेज होती है, चुनाव आयोग हरकत में आता है, सुरक्षा सहित तमाम सरकारी इंतजाम करने होते हैं, आचार संहिता लागू होती हैं और केंद्र व राज्य सरकार की ओर से जनता के लिए किए जाने वाले विकास कार्यों का क्रम बार बार बाधित होता है। एक देश एक चुनाव की धारणा में राज्यों और केंद्र के चुनाव एक साथ होंगे ताकि आने वाले कई सालों तक निर्बाध रूप से सरकारें कार्य कर सकें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से इसके समर्थक रहे हैं और कई बार इसका उल्लेख भी करते रहे हैं।


