Gandhi Jayanti Special :- “दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल” ये गीत तो आपने सुना ही होगा। इसमें महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) को ‘साबरमती के संत’ कहा गया है, और उन्हें इस तौर पर चित्रित किया गया है कि उन्होंने अपनी ‘अहिंसा के सिद्धांत’ के बल पर देश को आज़ादी (Freedom of India) दिलाई, लेकिन इस बात में पूरी सच्चाई नहीं है और इस बात में पूरी सच्चाई न होने के बावजूद भी न तो ‘गांधी’ की अहमियत कम होती है, न ही उनके ‘अहिंसा के सिद्धांत’ कमजोर पड़ते हैं। गांधी और उनके सिद्धांतों की अहमियत तब तक कायम रहेगी, जब तक भारतवर्ष का अस्तित्व है। अब ऐसे में सवाल ये है कि महात्मा गाँधी भारत के लिए इतने ख़ास क्यों हैं ? स्वतंत्रता संग्राम (Indian independence movement) में हज़ारों लोगों ने अपने प्राणों की कुर्बानी दी, लेकिन गाँधी किन मायनों में अलग थे कि उनके सिद्धांतों के आगे आज भी न सिर्फ भारतीय बल्कि दुनिया भर के लोग नतमस्तक होते हैं ?

Gandhi Jayanti Special : एक आम बालक, जो भारत के लिए ख़ास बन गया
- 2 अक्टूबर, 1869 को गुजरात राज्य के पोरबंदर (porbandar gujarat) में एक बालक का जन्म हुआ, नाम रखा गया मोहनदास करमचंद गांधी (Mohandas Karamchand Gandhi)।
- ये वो साल था, जब भारत की स्वतंत्रता के लिए हुए पहले संग्राम (1857 में पहला स्वतंत्रता संग्राम हुआ था) के 12 साल पुरे हुए थे।
- गांधी पश्चिमी भारत में एक रियासती राज्य में पले-बढ़े, एक ऐसे परिवार में जो कि बहुत ही रूढ़िवादी, सख्त और शाकाहारी था।
- उनका घर थोड़े उदासीन पिता द्वारा शासित (जैसा कि भारतीय पिता आमतौर पर उस समय होते थे, कुछ अभी भी हैं) था। उनकी माँ अति अनुरक्त (आमतौर पर सभी मांओं जैसी) थी।
- एक बच्चे के रूप में, वे बहुत शरारती थे और आवारा कुत्तों के कानों को मरोड़ना पसंद था। उन्होंने 13-14 साल की उम्र में शादी ( जैसा कि तब का प्रचलन था) की।
- वे विद्रोही स्वाभाव के थे। उन्होंने शाकाहारी परिवार में जन्म लेने के बावजूद मांस खाया, सिगरेट खरीदने के लिए पैसे चुराए, एक वेश्यालय का दौरा किया और आमतौर पर ऐसे काम किए जो कि एक किशोर अपने पिता के खिलाफ विद्रोह करने की पूरी कोशिश करने हेतु करता है।
- वह महत्वाकांक्षी थे, विदेश में अध्ययन करना चाहते थे। उनके पिता ने आपत्ति जताई, लेकिन उनके पिता के मरने के बाद गाँधी का रास्ता साफ़ हो गया और 19 साल कि उम्र में वे लंदन में कानून की पढ़ाई करने चले गए।
- 22 साल की उम्र में वे वापस आए और काठियावाड़ और बॉम्बे ( अब मुंबई) कोर्ट में अपने पेशे में अपना भाग्य आजमाया, लेकिन वे असफल रहे।
- दक्षिण अफ्रीका (South Africa) के नटाल में रहने वाले एक अमीर गुजराती भारतीय मुस्लिम व्यापारी, दादा अब्दुल्ला द्वारा गांधी की जिंदगी में उम्मीद की किरण जली। वे उस समय 24 साल के थे।
- एक मुकदमे के लिए वे वहां गए, 22 साल तक वहां रहे और भारतीयों के अधिकारों के लिए वे वहां लड़े। वहाँ उन्होंने 4 भाषाओं में एक अखबार चलाया, कुछ नाम कमाया और अंत में भारत लौट आए।
Gandhi Jayanti Special : दक्षिण अफ़्रीका से लौटने के बाद शुरू हुई ‘महात्मा’ बनने की कहानी
46 साल की उम्र में भारत लौटने के बाद शुरू हुई मोहनदास करमचंद गांधी के ‘महात्मा गांधी’ बनने की कहानी। गांधी ने अहिंसक विरोध के ज़रिए ब्रिटिश सरकार (British rule in India) के ख़िलाफ़ आज़ादी की लड़ाई लड़ी. अहिंसा के उनके सिद्धांतों ने दुनिया भर में लोगों को प्रेरित किया। गांधी जी ने भारत को आज़ादी दिलाने के लिए असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। गांधी जी ने ग़रीबों के हक़ के लिए आवाज़ उठाई और हरिजन उत्थान जैसे रचनात्मक कामों में भी लगे रहे। लेकिन वो सवाल अब भी अनुत्तरित है कि इससे वो इतने खास कैसे बन गए उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ की उपाधि हासिल हुई ?

Gandhi Jayanti Special : गांधी ने ही जलाई राष्ट्रीयता की अलख
दरअसल, भारत में अंग्रेज़ों की गुलामी से मुक्ति के लिए संग्राम, महात्मा गांधी के जन्म से पहले ही शुरू हो गया था। कई महान लोगों के नेतृत्व में स्वतंत्रता के लिए अंग्रेज़ों से जंग लड़ी जा रही थी, लेकिन इसका असर शून्य ही था। स्वतंत्रता संग्राम ने अपना असर दिखाना, या यूँ कहें कि अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें हिलानी तब शुरू की जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम का आगाज हुआ। एक ऐसी हुकूमत, जो अपने खिलाफ उठने वाली आवाजों को हथियारों के बल पर शांत करती थी, उसके विरुद्ध गांधी की अहिंसा के सिद्धांतों से प्रेरित लड़ाई, अपने आप में अभूतवपूर्ण तो था ही साथ ही एक साहसी फैसला था। उनके नेतृत्व में पूरा देश संगठित हुआ और फिर सामूहिक नेतृत्व ने अंग्रेजी हुकूमत को ख़त्म कर ही दम लिया।
- यहाँ गौर करनेवाली बात ये है कि, जिस राष्ट्रीयता और राष्ट्र का आज लोग दंभ भरते हैं, उसकी अलख महात्मा गांधी ने जलाई थी।
- ऐसा नहीं है कि महात्मा गांधी के जन्म से पहले भारत देश का अस्तित्व नहीं था, बल्कि आज की तुलना में एक विशाल भूभाग भारत देश के नाम से जाना जाता था, लेकिन महात्मा के स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व करने से पहले भारतीय कई वर्गों में बँटे हुए थे। एक राष्ट्र के रूप में सशक्त और संगठित करने का श्रेय महात्मा गांधी को जाता है।
- उन्होंने आम जनमानस को इस बात का एहसास कराया कि कैसे व्यक्ति विशेष की पहचान राष्ट्र से जुड़ी होती है और इसका ही असर था कि भारत का आम जनमानस राष्ट्रीयता के लिए संगठित हुआ और सबने एक साथ मिलकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बिगुल बजा दी।

आज जब देश एक बार फिर धर्म और जाति आधारित हिंसा (religion and caste based violence) का सामना कर रहा है, तब महात्मा गाँधी की प्रासंगिकता उजागर होती है। आज जरुरत है देश को महात्मा गांधी जैसे एक ऐसे नेतृत्वकर्ता की, जो सभी धर्मों को एकसूत्र में पिरोकर देश को बुलंदियों पर पहुंचाने का मार्ग सशक्त कर सके। जरुरत है महात्मा गांधी के उन सिद्धांतों को अपनाने की, जिसमें व्यक्ति विशेष में भेदभाव का कोई स्थान नहीं है।


