Home State Jagadguru Shankaracharya: जगद्गुरु शंकराचार्य ने लखनऊ में फूँका ‘गविष्ठि’ का बिगुल, 3 मई से उत्तर प्रदेश में गौ-युद्ध यात्रा शुरू होगी

Jagadguru Shankaracharya: जगद्गुरु शंकराचार्य ने लखनऊ में फूँका ‘गविष्ठि’ का बिगुल, 3 मई से उत्तर प्रदेश में गौ-युद्ध यात्रा शुरू होगी

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Jagadguru Shankaracharya: जगद्गुरु शंकराचार्य ने लखनऊ में फूँका ‘गविष्ठि’ का बिगुल, 3 मई से उत्तर प्रदेश में गौ-युद्ध यात्रा शुरू होगी

Jagadguru Shankaracharya: जगद्गुरु शंकराचार्य ने लखनऊ में फूँका ‘गविष्ठि’ का बिगुल, 3 मई से उत्तर प्रदेश में गौ-युद्ध यात्रा शुरू होगी

रिपोर्ट: आशीष कुमार

लखनऊ। “धर्म जहाँ पालन करने से बढ़ता है, वहीं अधर्म केवल सह लेने से बढ़ जाता है।” ये उद्गार परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ‘1008’ ने आज लखनऊ के कांशीराम स्मृति स्थल मैदान में आयोजित ‘धर्मयुद्ध शंखनाद’ कार्यक्रम में व्यक्त किए। कार्यक्रम में उपस्थित सैंकड़ों भक्तों और संत समाज ने शंकराचार्य जी के संदेश को गौरवपूर्ण माना।

शंकराचार्य महाराज ने मंच से ऐतिहासिक घोषणा करते हुए बताया कि गौ-माता को राष्ट्रमाता का सम्मान दिलाने और गौ-हत्या के कलंक को भारतभूमि से मिटाने के लिए आगामी 3 मई से सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में 81 दिवसीय ‘समग्र गविष्ठि गोयुद्ध यात्रा’ का शुभारंभ किया जाएगा। उन्होंने ‘गविष्ठि’ शब्द की वैदिक व्याख्या करते हुए कहा कि यह केवल यात्रा नहीं, बल्कि गौ-वंश की प्रतिष्ठा हेतु छेड़ा गया एक धर्मयुद्ध है। ऋग्वेद के मंत्रों का उद्धोष करते हुए उन्होंने कहा— ‘अहं हनं वृत्रं गविष्ठौ’, अर्थात् इस गोयुद्ध में हम अधर्म रूपी वृत्रासुर का समूल नाश करेंगे।

पूज्य महाराजश्री ने शास्त्र की पंक्ति ‘अन्यायप्रतिकारो हि धर्मः खलु सनातनः’ का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि अपराध को सहना अधर्म को बढ़ावा देना है। उन्होंने राजा परीक्षित का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार राजा ने गौ-माता के आँसू पोंछते हुए कलि को दंडित किया, उसी प्रकार आज के शासकों को भी कदम उठाने होंगे। महाराज ने आगाह किया कि जिस राज्य में गाय रोती है, वह राज्य विनष्ट होने के मार्ग पर है— ‘राज्यं नश्यति तस्याशु यत्र गावो रुदन्ति वै’।

शंकराचार्य ने वेशधारियों और पद-लोलुपों को भी कड़ी चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि जो लोग एक ही समय में गौभक्तों का वोट और गौहत्यारों का लाभ लेने का प्रयास करते हैं, वे सच्चे गोरखपंथी नहीं हो सकते। सन्यासी और विरक्त का पद पर लाभ लोलुप होना ‘दानवी प्रवृत्ति’ है। उन्होंने धर्म की शपथ लेने के बाद धर्मनिरपेक्ष शपथ नहीं लेने वालों को तत्काल एक स्थिर पथ अपनाने की चेतावनी दी, अन्यथा उनका सन्त समाज से बहिष्कार होगा।

महाराज ने लखनऊ के प्राचीन नाम ‘लक्ष्मणपुरी’ का उल्लेख करते हुए कहा कि यह भूमि शेष-अवतार लक्ष्मण की थी, जिन्होंने गौ-रूपी पृथ्वी के आँसू पोंछने का संकल्प लिया था। उन्होंने गोमती नदी को ‘गोमती विद्या’ का जीवंत स्वरूप बताते हुए कहा— ‘लक्ष्मणस्य शरो नैव व्यर्थो याति कदाचन’, लक्ष्मण का बाण कभी व्यर्थ नहीं जाता।

शंकराचार्य ने मतदान और गौ-हत्या के पाप पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि केवल कसाई ही पापी नहीं हैं, बल्कि गौ-वध की अनुमति देने वाला और मौन रहने वाला भी उसी पाप में भागी है। जो लोग ऐसे सरकारों को चुनते हैं जो गौ-हत्या रोकने में असफल हैं, वे भी कल्पों तक नर्क के भागी होंगे।

अंत में महाराजश्री ने धर्म की रक्षा हेतु ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी’ के गठन की घोषणा की। यह संस्था सन्त समाज में व्याप्त अशास्त्रीयता और अधर्म को दूर करने का कार्य करेगी। उन्होंने कहा कि धार्मिक समाज में धर्मनिरपेक्ष शपथ नहीं, बल्कि ‘धर्म की शपथ’ ही मान्य होगी।

 

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