Thursday, July 23, 2026

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UN Cybercrime Convention: संयुक्त राष्ट्र की ऐतिहासिक साइबर अपराध संधि पर 60 देशों ने हस्ताक्षर, भारत को मिले नए अवसर और चुनौतियां

UN Cybercrime Convention: संयुक्त राष्ट्र की ऐतिहासिक साइबर अपराध संधि पर 60 देशों ने हस्ताक्षर, भारत को मिले नए अवसर और चुनौतियां

रिपोर्ट: हेमंत कुमार


हनोई में आयोजित एक ऐतिहासिक समारोह में लगभग 60 देशों ने संयुक्त राष्ट्र की नई साइबर अपराध संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसका उद्देश्य तेजी से बढ़ते ऑनलाइन अपराधों के खिलाफ वैश्विक स्तर पर सहयोग को मजबूत करना है। इस संधि को “यूएन साइबरक्राइम कन्वेंशन” नाम दिया गया है, जो फिशिंग, रैनसमवेयर, ऑनलाइन तस्करी, डिजिटल धोखाधड़ी और घृणा भाषण जैसे बढ़ते साइबर खतरों से निपटने के लिए एक व्यापक कानूनी ढांचा तैयार करती है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने उद्घाटन सत्र में कहा कि “साइबरस्पेस अब अपराधियों के लिए एक नया मोर्चा बन चुका है। यह कन्वेंशन हमारी सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करने वाला एक ऐतिहासिक और कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता है।” वियतनाम के राष्ट्रपति लुओंग कुआंग ने इस समझौते को “वैश्विक एकता और बहुपक्षवाद की शक्ति का प्रतीक” बताया।

उन्होंने कहा कि यह दुनिया भर में शांति, स्थिरता और विकास के लिए साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हालांकि, इस संधि को लेकर तकनीकी जगत और मानवाधिकार संगठनों में चिंता भी व्यक्त की जा रही है। साइबरसिक्योरिटी टेक अकॉर्ड—जिसमें मेटा और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियां शामिल हैं—ने कहा कि संधि की कुछ धाराएं अस्पष्ट हैं, जो भविष्य में सरकारी निगरानी या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए इस्तेमाल हो सकती हैं। कुछ आलोचकों ने इसे “निगरानी संधि” तक कहा है। संयुक्त राष्ट्र ड्रग्स एंड क्राइम ऑफिस (UNODC) ने इन चिंताओं का जवाब देते हुए कहा कि समझौते में मानवाधिकारों की रक्षा और वैध साइबर शोधकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट प्रावधान जोड़े गए हैं। हस्ताक्षर समारोह में अमेरिका, यूरोपीय संघ, कनाडा सहित कई देशों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। हालांकि, अमेरिका और मानवाधिकार समूहों ने वियतनाम की ऑनलाइन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाए हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष वियतनाम में ऑनलाइन असहमति के लिए कम से कम 40 लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

भारत के दृष्टिकोण से यह संधि एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करती है। आज भारतीय साइबर अपराध जांच एजेंसियां सीमापार अपराध, एन्क्रिप्शन, विदेशी सर्वरों और कानूनी अड़चनों से जूझ रही हैं। यह संधि ऐसे अपराधों की जांच के लिए एक कानूनी रूप से बाध्यकारी ढांचा प्रदान करेगी। इससे विदेशी सर्वरों से डिजिटल साक्ष्य जैसे IP लॉग, सर्वर रिकॉर्ड, और क्रिप्टोकरेंसी ट्रांजैक्शन ट्रेस हासिल करने में आसानी होगी। साथ ही, प्रत्यर्पण प्रक्रिया सरल होगी और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ संयुक्त अभियान चलाए जा सकेंगे। संधि का एक बड़ा लाभ यह भी होगा कि साइबर अपराधों की कानूनी परिभाषाएं अब एकरूप होंगी। फिशिंग, रैनसमवेयर, बाल शोषण और घृणा भाषण जैसे अपराधों को वैश्विक स्तर पर समान रूप से परिभाषित किया जाएगा, जिससे भारतीय अदालतों में अभियोजन प्रक्रिया सरल होगी और आरोपी कानून की विसंगतियों का लाभ नहीं उठा पाएंगे। इस समझौते से भारत को उन्नत डिजिटल फॉरेंसिक उपकरण, डिक्रिप्शन तकनीक और क्रिप्टो ट्रेसिंग क्षमता जैसी सुविधाएं भी मिलेंगी। भारतीय जांचकर्ताओं को वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं का प्रशिक्षण मिलेगा और रीयल-टाइम साइबर खतरों के लिए अलर्ट सिस्टम विकसित करने में सहायता मिलेगी। संधि में चेन ऑफ कस्टडी प्रोटोकॉल और म्यूचुअल लीगल असिस्टेंस के प्रावधानों के चलते विदेशों से प्राप्त डिजिटल साक्ष्य अब भारतीय अदालतों में भी स्वीकार्य होंगे।

इससे न केवल जांच की विश्वसनीयता बढ़ेगी, बल्कि मामलों के निपटारे में गति भी आएगी। इसके अलावा, यह संधि उन देशों पर भी दबाव बनाएगी जो साइबर अपराधियों को शरण देते हैं या सहयोग से बचते हैं। भारत अब ऐसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय मंच पर जवाबदेही की मांग कर सकेगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि संधि में निगरानी के दुरुपयोग को रोकने, मानवाधिकारों की रक्षा करने और वैध साइबर सुरक्षा शोधकर्ताओं एवं व्हिसलब्लोअर्स की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान जोड़े गए हैं। यह संतुलन सुनिश्चित करता है कि सुरक्षा के नाम पर व्यक्तिगत स्वतंत्रता से समझौता न हो।
जागरूकता ही आपकी पहली सुरक्षा है — साइबर सुरक्षित रहें।

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